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कड़वी घुट्टी

Posted On: 14 Jan, 2016 Others में

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सुबह सुबह जब मेरी आँख खुली तो कुछ कठोर शब्द मेरे कानों के पर्दों को रौंदते हुए मेरे दिमाग की उस परत को झिंझोड़ गए जिसे हम संवेदनशील परत कहते हैं। कुछ दिनों से हमारे घर में मेहमानो का आना जाना लगा था। एक जिम्मेदार गृहणी की तरह अपने हर फ़र्ज़ को पूरा करती मैं उस दिन उस कडवी घुट्टी को गटक नहीं पाई और इस घटना ने मुझे लिखने की प्रेरणा दी। लिखने की लगन तो मुझ में काफी सालों से थी परन्तु कभी कलम उठाने की हिम्मत न कर पाई। एक औरत के जीवन की तुलना आज में कड़वी घुटी से कर रही हूँ। घुटी तो हमारे समाज में हर माँ अपने बच्चे को पिलाती है जिससे उसका बच्चा स्वस्थ रहे। उसकी पाचन शक्ति बढे और और वह हमेशा हँसता खिलखिलाता रहे। मेरी नज़रों में घुट्टी दो तरह की होती है एक मीठी घुट्टी जिसका सेवन केवल लड़के करते हैं और एक कड़वी घुट्टी जो सिर्फ लड़कियों के लिए होती है। कड़वी घुट्टी आखिर है क्या ? ये वे संस्कार हैं जो एक लड़की को बचपन से चटाए जाते हैं। धीरे हंसो , पलट के जवाब मत दो ,किसी के साथ गलत होते हुए भी देखकर चुप रहो ,पति परमेश्वर होता है उसकी आज्ञा मानो। उसकी हाँ में हाँ मिलाओ। परिवार वालों के हित में बात करो भले ही परिवार वाले या आपका जीवन साथी हर बात में आपको अपमानित करे। अपमान को इस तरह से पी कर मुस्कराओ जैसे बचपन में माँ के घुट्टी पिलाए जाने पर भी आप कुछ पल में उसका स्वाद भूलकर मुस्कराते और खिलखिलाते थे। अपनी पीड़ा को मन के किसी कोने में दबा कर ऐसे रखो जैसे वह खजाना हो और किसी की उस पर नजर न पड़े। यही सब बातें मेरी नज़रों में कड़वी घुट्टी है जो ज्यादातर परिवारों में एक लड़की को पिलाई जाती है। यह उस लड़की की कहानी है जिसे उसके परिवार में सब कुछ मिला न मिला तो सम्मान। जिसकी वह प्यासी थी। रीता एक भोली – भाली लड़की थी जिसका दिमाग कच्ची उम्र में कम ही काम करता था। वह अकेले रहना पसंद करती थी। लड़कियों के खेल या उनके कामों से उसका कोई नाता न था। एक छोटे शहर में एक संयुक्त परिवार में वह पली। किसी से अपना सुख दुःख न बाँटना ही उसकी नियति थी। समय बीतता गया उम्र के साथ साथ उसने गृहस्थ जीवन में कदम रखा। पति का प्यार तो मिला परन्तु सम्मान नहीं मिला। परिवार तो मिला परन्तु परिवार का साथ न मिला। अपने वजूद से लड़ते अपने आपको सम्मान दिलाने की चाह में जी जान से मेहनत की। उस कड़वी घुट्टी के हर पहलू को याद करते हुए अपने फ़र्ज़ को पूरा करने की कोशिश की। नौकरी करी बच्चों में अच्छे संस्कार डाले पति की हर आज्ञा को आदेश समझकर स्वीकार किया। इसी तरह दिन बीतते गए और शादी के बीस साल बाद जब उसने मुड़कर देखा तो यह पाया कि पीड़ा अभी भी खजाने की तरह उसके दिल में सुरक्षित है। माँ की हर सीख उसे कड़वी घुट्टी की तरह याद है। पति का प्यार तो बहुत है परन्तु सम्मान की कमी आज भी है। आज की युवा पीढ़ी से यही विनती करती हूँ कि जब आप एक लड़की को जन्म दो उसे इस दुनिया में लाओ तो उसे कड़वी नहीं मीठी घुट्टी ही पिलाइए जिससे वह आगे आने वाले भविष्य में सर उठाकर जिए और उस सम्मान की हकदार बने जो उसका जन्म सिध्द अधिकार है।
लेखिका – मीता गोयल

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